राष्ट्रपति चुनाव " दलित बनाम दलित "

संजीव सिंह की कलम से  " दलित बनाम दलित "



आजकल राष्ट्रपति चुनाव चर्चा का बिषय बना हुआ है। इसी पर आम आदमी पार्टी  उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल जोन कन्वीनर संजीव सिंह अपना मत लिखते है 



देश की राजनीति में इतनी गिरावट आ जायेगी, कि कल शायद राष्ट्रपति पद के चुनाव में ऐसा भी होगा कि ' मुस्लिम बनाम मुस्लिम ' भी हो सकता है। जबकि राष्ट्रपति एक व्यक्ति नहीं अपितु देश का प्रथम नागरिक होता है, जिसके द्वारा हम वैश्विक मंच पर देश की अवधारणा को व्यक्त करते है।लेकिन आज राष्ट्रपति का चुनाव व्यक्तित्व पर कम जातिगत ज्यादा हो चुका है जिसमें राष्ट्र की अस्मिता कम 2019 की बू ज्यादा आ रही है।
चलिये माना कि दलित दलित कह कर भाजपा समर्थित NDA ने श्री रामनाथ कोविद का समर्थन कर रही है तो क्या दलित राष्ट्रपति पहले नहीं हुए श्री के.आर .नारायणन पहले राष्ट्रपति थे जबकि राजनैतिक जीवन में आने के पूर्व एक नौकरशाह रहे और जब राष्ट्रपति का चुनाव लड़े तो उनके सामने एन.डी .ए .समर्थित भारतीय चुनावी प्रक्रिया के पितामह माने जाने वाले चुनाव आयुक्त श्री टी.एन.शेषन. थे जहाँ दो योग्य व्यक्ति के बीच चयन देश ने किया जहाँ जाति सामने नहीं आयी।  व्यक्तित्व की बात इसलिए कर रहा हूँ कि इस देश में कुछ ऐसे व्यक्तित्व के धनी लोग राष्ट्रपति बने जो पहले ही ''भारत रत्न " बन चुके थे जैसे सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी थे तब भी योग्यता ही प्राथमिकी बनी पद गौण रहा। 



लेकिन आज राष्ट्रपति पद के चुनाव के रूप में ''कोविद '' एक मोहरा नजर आते है इससे ज्यादा कुछ नहीं जहाँ तक व्यक्तित्व की बात करूँ तो श्रीमती मीरा कुमार के साथ मात्र पिता का नाम स्व.जगजीवन बाबू के पुत्री के रूप में नहीं बल्कि व्यक्तिगत व्यक्तित्व कहीं ज्यादा बेदागदार और स्वच्छ रहा है श्री कोविद से ...फिर भी UPA ने दलित बनाम दलित के नाम पर ही हल्ला बोल किया है!जहाँ तक राष्ट्रपति की बात करूँ तो ज्ञानीजैल सिंह जी के रूप में ज्यादा हिम्मती और संवैधानिक मूल्यों पर डटे रहे दूसरा नहीं देखा शायद कोविद वो बन पायेगे कि नहीं..? क्योंकि जैल सिंह राष्ट्रपति बनने के पूर्व स्व.इंदिरा गांधी और संजय गाँधी के प्रति जिस प्रकार भक्ति दिखाते थे उससे उम्मीद नहीं थी कि 400 से ज्यादा सीट ऐतिहासिक जीत दर्ज करके आने वाले पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी को तमाम बिल के साथ राष्ट्रपति पद का महत्व समझा दिया कि भारत का राष्ट्रपति ''रबर स्टम्प '' के रूप में नहीं होता। 



वही वर्तमान राष्ट्रपति महामहिम प्रणब मुखर्जी से बहुत उम्मीद थी कि राजनैतिक रूप से परिपूर्ण होने के बावजूद जब अरूणाचल,उत्तराखंड में केन्द्र की मोदी सरकार ने राष्ट्रपति शासन लगाया तो वह रबर स्टम्प ही नजर आये तभी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन लगाये जाने के विरुद्ध टिप्पणी किया- " कि राष्ट्रपति का आदेश राजा का आदेश नहीं जिसकी समीक्षा नहीं कि जा सकती " तब कोर्ट ने आदेश इसके विपरीत दिया।
बहरहाल वर्तमान राष्ट्रपति चुनाव से जाति जाति कहकर प्रथम नागरिक के रूप में देश की अस्मिता गिराने का कार्य हो रहा है व्यक्तित्व या देशनिर्माण पिछे धकेल दिया है।बस सत्ता सुख 2019 दिख रहा है!उम्मीद करता हूँ कि देश इससे आगे निकले नहीं तो कल ये भी स्वीकार करना होगा। 



" बन के इक हादसा बाजार में आ जायेगा, 
जो नहीं होगा वो अखबार में आ जायेगा, 
चोर,उच्चके,भ्रष्टो की करो कद्र,की मालूम नहीं! 
कौन, कब कौन सी सरकार में आ जाएगा ।


(ये मेरे व्यक्तिगत विचार है आप सहमत भी हो सकते है और असहमत भी क्योंकि आप भी लोकतांत्रिक नागरिक है) 

'' जय हिन्द ''
आपका- संजीव
आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश 

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