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बिहार में क्या बहार है, नीतिश सत्ता के लिये बेकरार है? - संजीव सिंह

बिहार में क्या बहार है, नीतिश सत्ता के लिये बेकरार है? - संजीव सिंह





आम आदमी पार्टी के पूर्वांचल प्रभारी संजीव सिंह जी बिहार की राजनीती में आये भूचाल पर कहते है कि देश की राजनीति में उत्तर भारत की राजनीति का विशेष स्थान रहा है खासकर बिहार का राजनीती विशेष है। ड़ा राजेन्द्र प्रसाद, जे.पी., कर्पूरी बाबू, जगजीवन बाबू इत्यादि महान राजनीतिज्ञ थे। इन महापुरुषों ने राजनीति के उन मूल्यों और वसूलो की राजनीति की जो कभी सत्ता, परिवार या दल के लिये नहीं बल्कि जनता और जनतंत्र के लिये किये थे। लेकिन वर्तमान बिहार के राजनैतिक घटनाक्रम से तो लगता ही नहीं कि ये वह बिहार है जिसकी राजनैतिक पटकथा उपरोक्त महान राजनैतिक हस्तियों ने कभी रखी थी। बात करते है महागठबंधन (लालू और नीतिश,कोंग्रेश ) के टूटने की,बड़ी अजीब बात लगती है। जब नीतिश कुमार एकाएक इस्तीफा देते है और यह कह कर कि "मै अब और नहीं सिद्धांतों से समझौता नहीं कर सकता। बड़ा अजीब लगता है कि सिद्धांत आखिर क्या है ? वो दल का है या स्वयं का है? क्या अब नीतीश का डी एन ए ठीक हो गया। अब नीतीश को कोई एतराज नहीं ये कौन सी नैतिकता की बात कर रहे है। 



थोड़ी चर्चा नीतिश बाबू के सैद्धांतिक राजनीति की भी कर लेते है। 1977 के जे पी आन्दोलन से निकला एक नौजवान जो समाजवादी,गैर संम्प्रदायिक राजनीति का चेहरा बनना चाहता था।समाजवादी नेता आपातकाल के नायकों में से एक जार्ज फर्नांडीस के शिष्य के रूप में सत्ता की राजनीति में नीतिश बाबू आगे बढ़े लेकिन समय तथा सत्ता का समीकरण बैठाते जार्ज की राजनीति को पहले किनारे लगाया ।सैद्धांतिक राजनीति का दूसरा रूप अटल बिहारी वाजपेयी के सरकार में रेलमंत्री के पद से इस्तीफा देना , फिर भाजपा की बैसाखी से एक दशक मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता में बने रहे और इसी बीच शीर्ष स्थान के राजनीति में मोदी के बराबर राष्ट्रीय राजनीति में अपने को स्थापित करने की कोशिश बनाये रखा।जब भाजपा के गोवा अधिवेशन में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नायक के नाम पर भाजपा के राजनैतिक पितामह आडवाणी के जगह मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया तब नीतिश का सिद्धांत फिर जाग उठा और गोधरा के मौत के सौदागर के साथ एन.डी.ए का अंग नहीं बनना कहकर गठबंधन से बाहर निकल गये। सैद्धांतिक राजनीति का नया रूप जब लालू प्रसाद यादव के  चारे घोटाले की राजनीति पूरे बिहार में चरम पर थी तब उसके मुख्य अगुवा के रूप मे भाजपा की बारात में दुल्हा नीतिश बाबू ही रहे। लेकिन सत्ता क्या क्या न कराती ये शायद नीतिश बाबू से अच्छा कोई नहीं जानता फिर वही ' चारा चोर ' लालू  प्रसाद यादव के साथ महागठबंधन की राजनीति सत्ता में बने रहने की जिसके लिये दिल्ली के मुख्यमंत्री और स्वच्छ राजनीति के नायक माने जा रहे अरविन्द केजरीवाल तक का इस्तेमाल किया क्यों केजरीवाल भी नीतिश बाबू की राजनीति नहीं पढ़ पाये।जब मोदी सरकार सत्ता में आयी तो दिल्ली में बगैर विधानसभा चुनाव के सत्ता में आने के लिये लगभग एक वर्ष विभिन्न हथकंड़े अपनाती रही लेकिन नीतिश कभी डटकर केजरीवाल के साथ खड़े नहीं हुए। सैद्धांतिक राजनीति सवाल खड़ा करती हैं कि जब लालू के घोटाले के खिलाफ लड़ाई लड़ी तो फिर लालू के साथ गठबंधन कर कौन सी नैतिकता की नाव पर सवार हो रहे थे 2015-16 में क्योंकि नितीश बाबू को सत्ता में बने रहने का खेल जानते थे। 20 महीने की गठबंधन के सरकार में और पहले नीतिश क्या क्या बातें कह गये। "मिट्टी में मिल जाऊगा लेकिन भाजपा के साथ नहीं जाऊँगा " इत्यादि । लेकिन नीतिश बाबू की तकलीफ शुरू होती है तेजस्वी यादव के कथित आरोप से नहीं बल्कि लालू प्रसाद यादव का बिहार,उ.प्र. चुनाव से भाजपा के खिलाफ बिगूल फूँक देने का और कहीं न कही यू.पी. ए. बढते कद और हैसियत का ये राजनैतिक जुगलबंदी शुरू होती है " नोटबंदी बराबर नशाबंदी " से जब नीतिश और नरेन्द्र मोदी एक दूसरे को इन मुद्दों पर बधाई देते है। 




चूँकि भाजपा मोदी के नेतृत्व में जिस प्रकार पूरे देश में राजनैतिक सामंतवाद की राजनीति कर रही है उसमें दो तीन चेहरे खटक रहे थे जिसमें पुराने साथी नीतिश ज्यादा नजदीक याद आये और नीतिश मोदी सरकार की लिखी पटकथा पर "नोटबंदी , दिल्ली एम.सी.डी. चुनाव के दौर से जी.एस.टी .तक लगातार मौन स्वीकृति देते आ रहे थे। रही बात भ्रष्टाचार/ सैद्धांतिक राजनीति की जिस पर नीतिश बाबू का कथित विलाप था तो आज जिस भाजपा के साथ हाथ मिलाया उसमें तो आरोप से ज्यादा अपराध कृत्य आरोप पत्र उ.प्र. में केशव प्रसाद मौर्या, मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ पर  न्यायालय के परिधि में टहल रहा है। कही न कही बिहार के राजनीति से लालू प्रसाद यादव का बढ़ता कद 27 अगस्त की गाँधी मैदान पटना में मोदी सरकार के खिलाफ आयोजित रैली से भी था जिसे लेकर कही न कही भाजपा भी भयभीत थी। पूरे प्रकरण से एक बात स्पष्ट हो चुकी है कि आज नीतिश कुमार की स्वच्छ छवि की राजनीति ने यह साबित कर दिया कि " सत्ता के लिये सब कुछ चलता है " सिद्धांत तथा विचार केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रह गया है। निःसंदेह मोदी सरकार के लिये अप्रत्यक्ष रूप से भविष्य की राजनीति के लिये एक सुखद एहसास है।आज मोदी को कहे या नीतिश को दल से ऊपर " अधिनायकवाद" की राजनीति ने भारत के राजनीति में अपने वर्चस्व को बढ़ा लिया है। भारत जैसे मजबूत लोकतंत्र के लिये अधिनायकवादी राजनीति घातक होने जा रही है क्योंकि इस राजनीति का अंत तानाशाही पर ही समाप्त होता है।



इतना तो तय है कि आने वाले दिनों की राजनीति में नीतिश मोदी की जोड़ी लम्बा भविष्य तो तय नहीं करेगी बल्कि अन्य छोटे क्षेत्रीय दलों की तरह नीतिश की ये घर वापसी जेड.यू .के लिए भष्माषुर साबित होगी। 2019 की मजबूत कड़ी में अब भाजपा अर्थात मोदी सरकार के सामने दो तीन व्यक्तित्व और दिखते है जिनमें केजरीवाल, ममता, अखिलेश..... हो सकते है ....?

कुछ भी हो नीतिश कुमार की राजनीति न तो विचारधारा, न तो सिद्धांत की है सिर्फ और सिर्फ सत्ता में बने रहने की ।

आपका- संजीव 

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