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प्रेस क्लब के चुनाव से प्रधानमंत्री दूर क्यों हैं : Ravish Kumar


वरिष्ठ पत्रकार रविश और पीएम नरेंद्र मोदी 


वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार ने अपने एफबी टाइम लाइन पर लिखा है कि  मुझे तो हैरानी हो रही है कि शनिवार को दिल्ली प्रेस क्लब के चुनाव के लिए अभी तक बीजेपी का कोई मंत्री या मुख्यमंत्री प्रचार करने क्यों नहीं पहुंचा है? कम से कम प्रधानमंत्री को तो एक रोड शो करना ही चाहिए। जब तक पीएम का रोड शो न हो तब तक प्रेस क्लब का चुनाव ही न हो। मन की बात भी करें, जिसे हर न्यूज़ चैनल के दफ्तर के बाहर बजाया जाए और वहां केंद्र के मंत्री खड़े होकर पत्रकारों को सुनवाएं। वैसे भी प्रेस क्लब वाले भी गुजरात गए पत्रकारों को फोन कर रहे हैं कि लौट आओ और हमें वोट दो।



चुनाव लड़ना कोई बीजेपी से सीखे। जल्दी ही बीजेपी के मुख्यमंत्री, मंत्री और केंद्रीय मंत्री अधिवक्ता और शिक्षक संघों के चुनाव में भी प्रचार करने पहुंच जाएंगे। आने वाले वक्त में डर के मारे कोई नहीं बताएगा कि उसके यहां चुनाव है, वरना क्या पता बीजेपी का कोई मंत्री आ जाए। बीजेपी को अपने इन मंत्रियों को एक चुनाव किट देना चाहिए जिसमें कैमरा हो, माइक हो, लाउड स स्पीकर हो, फेसबुक लाइव के लिए जीओ का सिम हो। अगर बीजेपी के नेताओं और मंत्रियों को भारत में रखना है तो ज़रूरी है कि भारत में चुनाव होते रहें, वर्ना ये लोग अगली फ्लाईट से रूस और बेला रूस के चुनावों में भी रैली करने पहुंच जाएंगे।


हंसी तो ख़ूब आती है मगर बीजेपी के चुनाव लड़ने के जज़्बे की दाद देनी होगी। बीजेपी में चुनाव के वक्त कोई ख़ाली नहीं रहता बल्कि जो ख़ाली रहता है वो भी चुनाव में रहता है। लोग हैरत में हैं कि गुजरात में केंद्र के 40-50 मंत्री प्रचार के लिए जा रहे हैं। भाई, जब प्रधानमंत्री ही दिल्ली में नहीं रहेंगे तो उनके मंत्री दिल्ली में रहकर क्या करेंगे। जब प्रिंसिपल ही स्कूल में नहीं हैं तो उस दिन टीचर छुट्टी तो कर ही लेंगे। प्रधानमंत्री भी अपने स्मार्ट हैं। इसलिए वे मंत्रियों को भी चुनाव में ले जा रहे हैं। आखिर वे ही बेहतर जानते होंगे कि मंत्रालय में किसके पास कितना काम है। विभाग तो मैनेज होता नहीं, कम से कम बूथ तो मैनेज करें।



सुनने में आ रहा है कि प्रधानमंत्री 30-35 रैलियां करने वाले हैं। हालांकि उनकी क्षमता से यह कम है। देश के काम में व्यस्त न होते तो अकेले प्रधानमंत्री सभी विधानसभा में 182 रैलियां कर देतें। वैसे वे पिछले कई महीने से गुजरात जा रहे हैं। मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री की रैलियों का डिटेल मिल रहा है मगर अमित शाह कितनी रैलियां करेंगे, इसका डिटेल नहीं मिल रहा है। क्या वे भी पचास साठ रैलियां करेंगे या ज़्यादातर अहमदाबाद में ही रहेंगे ? अगर किसी को अपने राज्य के मंत्री से कोई काम है तो वह तुरंत गुजरात चला जाए, पता करे कि किस गली में उसके स्वास्थ्य मंत्री की घरयात्रा हो रही है, किसी घर से बाहर निकले और आवेदन पकड़ा दे। सर आप पटना में तो मिल नहीं रहे थे सोचे कि पाटन में तो पकड़ाइये जाएंगे।
बीजेपी चुनाव गंभीरता से लड़ती है इसके लिए उसके तमाम मंत्री गंभीर कामों को छोड़ चुनाव में व्यस्त हो जाते हैं। राज्यों के शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे विभागों के मंत्री भी हफ्तों से चुनाव वाले राज्य में प्रभारी बना कर भेज दिए जाते हैं। केंद्र के राज्य मंत्री चुनाव वाले राज्य में ज़िला- ज़िला, कस्बा-कस्बा घूम रहे होते हैं। 


इसके अलावा पार्टी के तमाम संगठनों के प्रभारी, संघ के कार्यकर्ता ये सब तो खुदरा-खुदरी टाइप से घूमते नज़र आते हैं। उपचुनाव से लेकर नगरपालिका चुनावों में भी बीजेपी मुख्यमंत्री और मंत्री को उतारने लगी है। महाराष्ट्र में गली गली में मंत्री रैली कर रहे थे। यूपी में भी कर रहे हैं। इन सबके रहने खाने, आने-जाने का ख़र्चा कौन देता होगा।



कई बार लगता है कि गुजरात में भाजपा चार बार से सरकार में है। वहां बीजेपी के स्थानीय कार्यकर्ता और नेताओं का अपना जाल तो होगा ही। इन लोगों के पास क्या काम बचता होगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये लोग गुजरात बाहर के नेताओं और मंत्रियों की कार के आगे अपनी कार लेकर चलते होंगे ताकि सही जगह पहुंचाया जा सके। ऐसा न हो जाए कि गुजरात बीजेपी के कार्यकर्ता दूसरे राज्य में घूमने चले जाएं। बूथ स्तर से लेकर मकान स्तर तक बीजेपी के नेताओं, मंत्रियों को आते जाते देखकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के मनोबल पर क्या असर पड़ता होगा? वे भी बीजेपी का ही प्रचार करने लग जाते होंगे । दाद देनी होगी कि इस भीड़ में कांग्रेस का कोई कार्यकर्ता जीत के प्रति आश्वस्त न होते हुए भी गलियों में घूमता होगा। यही दिन कभी भाजपा ने देखा होगा जब कांग्रेस का ऐसा ही दबदबा होता होगा।



गुजरात में बीजेपी की जीत पर कोई भी शक नहीं करता है। जो करता भी है तो बोलता नहीं। वो एक ऐसा राज्य है जहां सूरज भले उगे न उगे, बीजेपी ज़रूर जीतती रहेगी। तब वैसे राज्य में प्रधानमंत्री को मन की बात करनी पड़ रही है। उसे हर बूथ पर सुनाने के लिए पार्टी के कार्यकर्ता, नेता,उम्मीदवार, , केंद्रीय मंत्री, दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री, सांसद और विधायकों को उतारा जा रहा है ताकि वे देखें कि मन की बात सुन रहे हैं। मन की बात को एक ग़ैर राजनीतिक स्पेस के रूप में स्थापित किया जा रहा था अब उसका इस्तमाल वोट दो टाइप कार्यक्रम में होने लगा है।



मीडिया रिपोर्ट पढ़कर एक ख़्याल मन में गुदगुदाता है। प्रति मतदाता प्रति नेता की पहुंच के मामले में बीजेपी अव्वल न हो जाए। वोटर भी बीजेपी के नेता को देखते कहने लगता होगा कि ठीक ठीक है, आने की ज़रूरत नहीं, हम वोट दे देंगे। चुनाव के बाद किसी को रिसर्च करना चाहिए कि किस मतदाता ने इन नेताओं या मंत्रियों से मुलाकात के बाद भी बीजेपी को वोट नहीं किया, क्यों नहीं किया और किसने दिया, क्या कोई ऐसा वोटर भी था जो मंत्री को अपनी गली में देखकर वोट दे आया।

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