क्या EVM के आने के बाद लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पहले से ज्यादा खतरे में है ?





एक बार फिर से  EVM छेड़छाड़ के बारे में गुजरात चुनाव के समय से ही चर्चा में है। इस पर लोग अपनी अपनी राय टीवी चैनलों से लेकर सोशल मीडिया पर दे रहे है। महत्वपूर्ण बिंदु ये है की एवं से छेड़-छाड़ हो सकती है या नहीं, ये बात 1987 से, जब पहली बार EVM का परीक्षण किया गया तब से चर्चा में है। 


इसके बावजूद विभिन्न केंद्र सरकारों ने बूथ लूट की घटनाओं का हवाला देते हुए इन परीक्षणों को ज़ारी रखा और अंततः EVM से वोटिंग को पूरी तरह लागू किया गया। पहले हम  तकनीकी बातों को समझने की कोशिस करते है फिर क्या EVM के आने के बाद लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पहले से ज्यादा खतरे में है या नहीं  और अंत में EVM के सम्बन्ध में  कुछ अन्य बातों को भी समझने की कोसिस  करते है। 


कुछ जानकारों का मानना है की एक मूल झूठ जो की EVM के बारे में बोला जाता है वो ये है की इनमें जिन माइक्रोप्रोसेसर का प्रयोग किया जाता है उनको फिर से नहीं लिखा जा सकता है। 
इलेक्शन कमीशन (EC) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने इस तर्क का प्रयोग कई बार किया है। अगर किसी माइक्रोप्रोसेसर को फिर से लिखे जाने के लिए बंद किया जाता है तो उसके दो तरीके हैं - सॉफ्टवेर लॉक द्वारा या राइटिंग पिन को हटा कर। 


इन दोनों को तोड़ने के कई तरीके हैं जिनके बारे में आप गूगल या हार्डवेयर फ़ोरम्स पर देख सकते हैं। परन्तु इससे भी आसान तरीका है - प्रोग्राम या चिप से छेड़छाड़ करने के जगह इनपुट से छेड़छाड़ करके। जिन वायर से आपके द्वारा दबाये गए बटन का संकेत बैलट यूनिट (BU) से कण्ट्रोल यूनिट (CU) को जाता है, उनमें एक छोटी सी चिप लगाकर ये किया जा सकता है। 

हालाकि वायर से छेड़छाड़ के बारे में कोई ज्यादा बात नहीं करता और ये सुनने में बहुत ही बचकाना भी लगता है, पर बड़े बड़े किलों में सेंध अक्सर एक बहुत छोटी सी वजह से ही लगती है। तारों से छेड़छाड़ पूरे EVM से छेड़छाड़ के मुकाबले आसान और कम शक पैदा करने वाला काम है। 


एक गौर करने की बात ये भी है की ना ही EC ना ही BEL को ये पता है की माइक्रोप्रोसेसर के अन्दर जो कोड है उसमें वास्तव में क्या लिखा है। वे साधारण ब्लैक बॉक्स टेस्टिंग करते हैं ना की ज्यादा विश्वसनीय वाइट बॉक्स टेस्टिंग, यह तथ्य की ना ही EC ना ही BEL को माइक्रोप्रोसेसर के अन्दर के कोड के बारे में कोई जानकारी नहीं है, ओमेश सहगल नाम के पूर्व आईएस अधिकारी द्वारा दायर की गयी RTI के जवाब में सामने आया था।  

VV Rao नाम के एक व्यक्ति ने 2009 में भी EVM को चुनौती दी थी। राव और चुनाव आयोग के बीच कई पत्रों का आदान प्रदान हुआ जिनकी प्रति चुनाव आयोग की वेबसाइट पर है। 


राव और सहगल की बातों और उसमें नए परिपेक्ष जोड़ते हुए भाजपा नेता व राष्ट्रीय प्रवक्ता  GVL नरसिम्हा राव ने 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद EVM के बारे में एक किताब (Democracy at Risk ) लिखी जिसका लोकार्पण लाल कृष्ण अडवाणी ने किया था। हालाकि 2014 चुनाव के बाद से GVL इस बारे में बात नहीं करते है। 

2009 में ही चुनाव आयोग (EC )ने पहली बार Hackathon का ऐलान किया था। हालाकि कुछ लोगो का मानना है की EC ने सही तरीके से Hackathon नहीं करवाया था। 


इसके बाद VV Rao ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की (Petition (civil) No 292 of 2009 ) 2010 में राव के साथ काम करने वाले हरी प्रसाद ने University of Michigan के Professor J Alex Halderman के साथ मिलकर एक EVM को हैक करके दिखाया था। इसके बाद EVM की चोरी के आरोप में हरी प्रसाद की गिरफ्तारी हुई। 

2013 में राव की याचिका पर सुनवाई कर उच्चतम न्यायलय ने माना की EVM पूरी तरह सुरक्षित नहीं है और VVPAT लागू करने के निर्देश दिए।  हालाकि ये निर्देश आज तक पूर्णतया कार्यान्वित नहीं किये गए हैं। VVPAT का उद्देश्य मतदाता को उसका वोट सही जगह गया, इसका भरोसा दिलाने का है। 



एक अन्य तथ्य ये भी है की माइक्रोप्रोसेसर में जो कोड है, वो लिखा तो भारत में गया है, पर उसको चिप पर 'बर्न' करने के लिए विदेश भेजा जाता है। जब वो चिप वापस आती है तो उसकी सिर्फ़ ब्लैक बॉक्स टेस्टिंग होती है। अतः कोड में अगर कोई bug है तो उसका पता चलना कठिन है। पर ऐसा नहीं है की वाइट बॉक्स टेस्टिंग असंभव है।  Apple जिन माइक्रोप्रोसेसर को Samsung से लेता है उसकी पूरी तरह वाइट बॉक्स टेस्टिंग करता है। अगर apple कर सकता है तो 130 करोड़ के देश का भाग्य विधाता चुनने वाली मशीन के लिए क्यूँ नहीं?

एक अन्य तर्क जो की EC बहुत ही ज्यादा प्रयोग करता है वो है EVM का इन्टरनेट से कनेक्टेड ना होना।  हालाकि EC ने कभी ये नहीं बताया की अगर ऐसा है तो मोबाइल फ़ोन को पोलिंग बूथ के अन्दर ले जाने की मनाही क्यूँ है? और EC इस सवाल के जवाब से आज तक कतराता रहा है। 

EVM की assembling BEL के बंगलुरु स्थित केंद्र में होती है जहां ज्यादातर काम प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर्स को दिया गया है।  इन प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर्स के क्या अन्य व्यवसायिक काम हैं ये भी एक जांच योग्य विषय है। 


एक तर्क है की 'इतने बड़े पैमाने पर EVM से छेड़छाड़ मुश्किल है, एक इलेक्शन जीतने के लिए कितनी मशीनों से छेड़छाड़ करनी होगी? एक विधानसभा में हार-जीत के अंतर का माध्य या औसत 5000 वोट के आसपास होता है। हर EVM में 3000 तक वोट स्टोर किये जा सकते हैं, पर फिलहाल एक बूथ में औसत वोटरों की संख्या 1200 के आसपास होती है। अगर इन 1200 में से 50%, यानि 600 वोट किसी एक पार्टी के पक्ष में जाने के मकसद से EVM में छेड़छाड़ की जाए, तो क्या होगा? 9 EVM में 50% वोटों की गड़बड़ी करके 5400 वोटों की हेराफेरी की जा सकेगी। ये ध्यान देने की बात है की एक बढ़ा वोट किसी अन्य प्रत्याशी से घट भी रहा है। 
तो 5 EVM को 50% वोटों के लिए गड़बड़ी करके चुनाव परिणाम में उलटफेर किया जा सकता है। 
विधानसभाओं में 150 से 200 पोलिंग बूथ होते हैं और हर बूथ पर एक EVM होती है। मान लें की हर विधानसभा में 180 पोलिंग बूथ हैं और हर बूथ पर 5 EVM में गड़बड़ी की गयी है। साधारण गणित से आपको पता चल जायेगा की 3% से भी कम EVM में गड़बड़ी से परिणाम बदला जा सकता है। तो चुनाव का परिणाम और जनता की आवाज़ को बदलने के लिए 100% EVM में गड़बड़ी नहीं करने की ज़रुरत है। मात्र 3% गड़बड़ी हमारे लोकतंत्र की हत्या करने के लिए काफ़ी है। 


अब VVPAT पर वापस आते हैं। VVPAT का अर्थ है 'Voter-verified paper audit trail'. VVPAT का पूरा मकसद वोटर को इस बात का भरोसा देने का है की उसका वोट सही व्यक्ति को गया। पर क्या वर्तमान में VVPAT ये भरोसा दिलवा पा रहा है? हर चुनाव के बाद EVM पर सवाल उठ रहे हैं। कई बार अनुरोध और प्रतिरोध के बावजूद EC ने VVPAT की गिनती करवाने में आनाकानी दिखाई है। 

अब गुजरात चुनावों में हर पोलिंग स्टेशन पर एक VVPAT की गिनती की बात कही जा रही है। एक पोलिंग स्टेशन में औसतन 3 पोलिंग बूथ होते हैं। मान के चलते हैं की 180 पोलिंग बूथ और 50 पोलिंग स्टेशन हैं। अगर हर विधानसभा के 1 पोलिंग बूथ पर VVPAT मिलाया गया तो तकरीबन 0.55% पर्चियों का मिलान होगा। अगर हर विधानसभा के 1 पोलिंग स्टेशन की सभी EVM पर VVPAT मिलाया गया तो तकरीबन 2% पर्चियों का मिलान होगा। क्या 0.55% या 2% पर्चियों का मिलान काफ़ी है?




इस तरह से नागरिकों का लोकतंत्र से विश्वास घटेगा।  EC की जिम्मेवारी है की वो ऐसा ना होने दे और उचित कदम उठाये। पर्यावरण का तर्क भी EVM के पक्ष में दिया गया है।  कहा जाता है की कागज़ की बर्बादी रूकती है EVM के इस्तेमाल से पर EVM के ख़राब होने के बाद जो इलेक्ट्रॉनिक कचरा निकलता है उसके बारे कोई बात नहीं करता। कागज़ का तो आसानी से पुनर्चक्रण किया जा सकता है, EVM का नहीं। 




EVM चोरी भी एक अलग समस्या है. सिर्फ़ आंध्रप्रदेश में 4000 EVM चोरी होने की घटना सामने आई थी। चोरी होने के बाद इन EVM के साथ क्या हुआ, कोई नहीं जानता।  एक महत्वपूर्ण बात  किसी का ध्यान नहीं जाता EVM के देखरेख। कौन हैं वो लोग जो EVM की देखरेख करते हैं? जब भी चुनाव के दौरान EVM ख़राब होती है तो कुछ लोग आते हैं, कौन हैं ये लोग? EVM की देखरेख की जिम्मेवारी भारत सरकार की एक एजेंसी  ECIL  के पास है। पर ECIL एक साथ देश भर में कैसे EVM के साथ अपने लोगों को रख पाती है? इसका जवाब मध्य प्रदेश में एक RTI एक्टिविस्ट के द्वारा मिला। 




इस जवाब से स्पष्ट है की - हर जिले का डीएम अपने यहाँ से कुछ लोगों को ECIL के लोगों से ट्रेनिंग के लिए राज्य निर्वाचन आयोग भेजता है। इन लोगों को 'मास्टर ट्रेनर' कहा जाता है।  पर कौन हैं ये 'मास्टर ट्रेनर'? इसका जवाब शायद EC या डीएम ही दें तो बेहतर है। 





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