प्रधानमंत्री की रूटीन प्रतिक्रिया से आगे के कुछ सवाल है जिन पर टिके रहिए : रवीश कुमार


प्रधानमंत्री की रूटीन प्रतिक्रिया से आगे के कुछ सवाल है जिन पर टिके रहिए : रवीश कुमार
रवीश कुमार और पीएम नरेंद्र मोदी 



वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार लिखते है कि जम्मू कश्मीर सरकार में शामिल बीजेपी के दोनों मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया है। यह काम उसी दिन हो जाना चाहिए था जब ये हिन्दू एकता मंच की सभा में गए थे। इसी तरह केंद्र के कुछ और मंत्रियों के ख़िलाफ़ कार्वाई हो जानी चाहिए जो हर सांप्रदायिक तनाव को ख़ास एंगल देने पहुंच जाते हैं। गिरिराज सिंह, अश्विनी चौबे, छेदी पासवान और अन्य कई सांसद तनाव के माहौल को गरमाने चले जाते हैं, धार्मिक भेदभाव बढ़ाने वाले बयान देते हैं, ललकारते हैं, उन को भी काबू करना चाहिए और कार्रवाई करनी चाहिए। अभी जो हुआ है वो ठीक है। दो मंत्रियों का इस्तीफा हुआ है। 

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प्रधानमंत्री का रूटीन बयान भी आया है और कार्रवाई भी हुई है। वो भी ठीक है। कांग्रेस को भी अपने भीतर के सांप्रदायिक तत्वों से दूरी बनानी चाहिए। उसे बताना चाहिए कि बार संघ के अध्यक्ष का इस वक्त पार्टी में क्या रोल है, उसे चेक करना चाहिए कि उस तरह के नेता पार्टी के भीतर हैं या नहीं। दबाव डालिए कि हर दल से सांप्रदायिक भगाए जाएं। यह ज़हर है। यह जनता के हित में नहीं है।

मैंने प्रधानमंत्री के बयान को रूटीन क्यों कहा? देर और दबाव में आया यह बयान स्वाभाविक सा है। सवाल भीड़ की मानसिकता का था जो मज़हबी नफ़रत से लैस थी। तिरंगे के अपमान का था जिसके सहारे बलात्कार के आरोपियों को बचाने का प्रयास हुआ। चलिए यह राजनीति की बात हो सकती है मगर आगे किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को इस तरह के रूटीन बयान न देने पड़े कि सख़्त कार्रवाई होगी, आप और हम यह देखें कि किसी भी राज्य में पुलिस और न्याय व्यवस्था निष्पक्ष और स्तरीय नहीं है। हर जगह पुलिस की छवि मैनेज हो जाने की है और बदले में माल बनाने की है। 

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बेशक उसी सिस्टम में कई पुलिस अधिकारी बहुत अच्छा काम करते हैं। मगर वे अपनी पहल पर, तमाम तकलीफों को सहते हुए ये काम करते हैं। उन्हें भी सिस्टम सपोर्ट नहीं करता है। लिहाज़ा इन अपवादों के बाद भी जनता का शक बना रहता है। उसे नहीं लगता कि बिना भीड़ लाए पुलिस कोई काम पेशेवर तरीके से करेगी। पुलिस ने अपना काम किया होता तो लड़की को लखनऊ तक आकर हंगामा नहीं करना पड़ता और उसके पिता की हत्या नहीं होती।

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हमारी पुलिस मंत्री, विधायक और सांसद के दबाव में चलने लगी है। किसी भी पार्टी की सरकार हो, यथार्थ यही है। अदालतों की दनिया का भी यही हाल है। ज़मानत देने में जो खेल होता है, वो शर्मनाक है। मामूली आरोप और केस को निपटाने में वर्षों लग रहे हैं और इससे लोगों का जीवन बर्बाद हो रहा है। जब तक हमें सरकार के हस्तक्षेप से मुक्त ईमानदार जांच व्यवस्था, पुलिस व्यवस्था और न्याय व्यवस्था नहीं मिलेगी, भीड़ बनती रहेगी। हम इसे कांग्रेस बनाम बीजेपी की नज़र से देखेंगे तो कहीं नहीं पहुंचेंगे। अदालत परिसर में हंगामा करने वाले वकीलों के लिए कोई नियम बनना चाहिए। दिल्ली के पटियाला कोर्ट और जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट में वकीलों की भीड़ की घटना से सुप्रीम कोर्ट को कुछ नया और सख्त करना चाहिए।

इस देश में सौ फीसदी मुमकिन है किसी को झूठे आरोपों में फंसा कर वर्षों मुकदमें में लटका दिया जाए। यह प्रवृत्ति कब ख़त्म होगी। कब इस पर ठोस रूप से लगाम लगेगा। मैं बलात्कार या किसी भी मामले में फांसी देने, चौराहे पर गोली मार देने की बात से सहमत नहीं हूं। सख़्त कानून और भीड़ के इंसाफ़ से कुछ हासिल नहीं हुआ। आज तक निर्भया नाम बदल बदल कर मरी जा रही है। 

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पुलिस को पेशेवर करना ही होगा। पुलिस के भीतर लोग बहुत कम हैं। आप किसी पुलिस अधिकारी से बात कीजिए, वह अपने पैसे से पेट्रोल जला कर मौके पर जाता है। ज़ाहिर है वह समझौता करेगा। किसी से मांगेगा। बारह बारह घंटे काम करेगा तो उसका दिमाग़ चलेगा या थक जाएगा आप अंदा़ज़ा लगा सकते हैं। इसलिए फांसी देने और गोली मार देने की बात से दूर रहिए। हमारे आस-पास बलात्कार की मानसिकता रोज़ पनप रही है, उससे लड़िए। उसे ख़त्म कीजिए। औरतों को लेकर जो घृणा है उसे दूर कीजिए। मर्द की श्रेष्ठता पर हमला कीजिए।

मीडिया ट्रायल नहीं होना चाहिए। कठुआ में चूंकि भीड़ तिरंगा लेकर और जय श्री राम के नारे लगाते हुए चार्जशीट दायर होने से रोक रही थी, इसलिए चर्चा हुई। भीड़ ट्रायल करना चाहती थी। उसमें मंत्री शामिल थे। उन्नाव में भी लगा कि सत्ता किसी एक विधायक के पक्ष में है, इसलिए चर्चा हुई। विधायक की भीड़ एस आई टी को रोक रही थी। दोनों ही केस में एक एक ही हत्या की गई थी, इसलिए यह मीडिया ट्रायल के दायरे में नहीं आता है। 

मीडिया ट्रायल की सीमा जहां से शुरू हो, वहां से रूक जाना चाहिए। कितनी भी बदहवासी हो, कितना भी गुस्सा हो तर्कों और तथ्यों की आवाजाही के रास्ते खुले रखिए। पर्याप्त सुविधाओं से लैस ईमानदार पुलिस और न्याय व्यवस्था की मांग कीजिए। जज किस पार्टी का है इन बातों को लेकर सामान्य मत हो जाइये। भिड़ जाइये सिस्टम से कि जज क्यों सरकार के हिसाब से फैसला देगा या मैनेज होगा।

जांच कैसे कोई मैनेज कर सकता है। ये सब मत होने दीजिए वर्ना आप फिर ज़ीरो पर पहुंचेंगे और अगले किसी केस में एक एफ आई आर के लिए संघर्ष करते नज़र आएंगे। भीड़ और मीडिया के ज़रिए सवाल उठना चाहिए मगर तय नहीं होना चाहिए कि कौन अपराधी है। लेकिन यह सब होगा जब तक हमारे सामने सिस्टम नहीं होगा। मुझे नहीं लगता कि वो कभी होगा। सब कुछ अपवाद से चलेगा, नियम से नहीं।
रवीश कुमार 


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