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चौकीदारों से मोदी संवाद के कवरेज़ को लेकर चैनलों की चतुराई भी देखे चुनाव आयोग - रवीश कुमार

चौकीदारों से मोदी संवाद के कवरेज़ को लेकर चैनलों की चतुराई भी देखे चुनाव आयोग - रवीश कुमार



प्रधानमंत्री मोदी ने रेडियो के ज़रिए चौकीदारों से बात की। कार्यक्रम रेडियो का था मगर उसे टीवी के लिए भी बनाया गया। इसे सभी न्यूज़ चैनलों पर लगातार दिखाया गया। सभी चैनलों पर एक ही कवरेज़ रहा और एक ही एंगल से सारे वीडियो दिखे। किसी चैनल ने अपने दर्शकों को नहीं बताया कि स्क्रीन पर जो वीडियो आ रहा है, वो किसका है। बीजेपी की तरफ से प्रसारित हो रहा है या न्यूज़ एजेंसी ए एन आई की तरफ से। क्या ए एन आई विपक्ष के कार्यक्रम को भी इसी तरह से कवर करता है और चैनल दिखाते हैं?





यही नहीं जो चौकीदार खड़े दिख रहे हैं वो किसकी कंपनी के हैं। उन कंपनियों का क्या बीजेपी से क्या नाता है। एक कंपनी है एस आई एस जिसके संस्थापक आर के सिन्हा हैं, जो भाजपा के राज्य सभा सांसद हैं। क्या चैनलों ने बताया कि विजुअल में जो गार्ड दिख रहे हैं को वो एस आई एस के हैं और इनके संस्थापक बीजेपी के सांसद हैं? चैनलों ने आपको नहीं बताया। क्या चुनाव आयोग को इसकी जांच नहीं करनी चाहिए कि प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के लिए कहीं एस आई एस के गार्ड को आदेश तो जारी नहीं किया गया। बाकी गार्ड किस कंपनी के थे और क्या उनका संबंध बीजेपी नेताओं से था, दर्शक नहीं जान सका।


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एंकर बार बार कहते रहे कि प्रधानमंत्री ने 25 लाख चौकीदारों से संवाद किया। मगर किसी ने नहीं बताया कि वे यह बात किस आधार पर कह रहे हैं। प्रधानमंत्री के संबोधन के दौरान चैनलों के स्क्रीन पर गार्ड दिखाए गए, उनकी कुल संख्या 500 भी नहीं होगी। हर जगह पचीस तीस गार्ड बैठे हुए नज़र आए। तो मीडिया को कहना चाहिए कि यह बीजेपी का दावा है कि 25 लाख चौकीदारों को संबोधित किया गया। हमने अपनी तरफ से संख्या की पुष्टि नहीं की है।





पहला सवाल यही था कि " सर मेरा एक सवाल था आपसे, हम गांव के गरीब परिवार से आते हैं, इज्जत ही हमारी पूंजी है। कई महीनों की मेहनत से सम्मान और भरोसा जीतते हैं। राजनीति के चलते हुए हमें चोर कहा गया है। हम जहां काम करते हैं, वहां हमें शक की नज़र से देखा रहा है। देश के सारे जवान भी चौकीदार हैं, क्या वे भी चोर हैं। मन बहुत दुखी हो रहा है, इसलिए आपसे ये सवाल की हूं।"


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यूपी के फर्रूख़ाबाद की रेणु पीटर ने यह सवाल किया था। सवाल की बनावट से ज़ाहिर होता है कि पूछने वाले को लिख कर दिया गया था। जिसे हम पत्रकारों की भाषा में प्लांट कहते हैं। पिछले दो दिनों से सिक्योरिटी गार्ड अपने कम वेतन, निम्न जीवन स्तर की बात कर रहे है। सरकारी चौकीदार समय से वेतन न मिलने की शिकायत कर रहे हैं। किसी ने अपने मुद्दे की बात नहीं रखी। क्या वाकई ऐसा हो सकता है।






चुनाव आयोग को देखना चाहिए कि मी़डिया अपने कवरेज़ में बाकी दलों को कितनी जगह देता है। यह सीधा सीधा पेड न्यूज़ का मामला है। पेड न्यूज़ तभी नहीं होता तब बोरी में नोट भर कर भेजा जाता हो। मीडिया के कवरेज़ को ध्यान से देखिए। चुनाव आयोग अगर नहीं देखता है तो वह निराश करेगा। चुनाव आयोग को इतना भी भोला नहीं बनना चाहिए। मीडिया का कवरेज़ निष्पक्ष चुनाव के लिए बहुत ज़रूरी है। अगर यह एक पक्षीय हो जाए तो फिर चुनाव आयोग के पास नैतिक बल नहीं रह जाता है कि वह निष्पक्ष चुनाव कराने का दावा करे।

रवीश कुमार 

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