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क्या नीतीश कुमार फिर होंगे एनडीए होंगे बाहर ?

पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम नितीश कुमार 


एनडीए सरकार के नए मंत्रिमंडल में जदयू को जगह नहीं मिलने के बाद बिहार में लगातार नाटकीय सियासी घटनाएं हो रही हैं और इन घटनाओं के साथ ही तरह-तरह के कयास भी लगाए जा रहे हैं। 




कयास इसलिए भी लगाए जा रहे हैं कि पूर्व में ऐसी ही सियासी घटनाओं के बाद यहां के राजनीतिक समीकरण कई दफा बदल चुके हैं। चाहे वो नीतीश का एनडीए से बाहर आना हो, राजद के साथ मिलकर बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ना हो या फिर वर्ष 2017 के मध्य में एनडीए में नीतीश कुमार की ‘घर वापसी’ हुआ।




2019 के आम चुनाव अकेले भाजपा को मैजिक फिगर से ज्यादा सीटें मिलने से एनडीए के सहयोगी दलों को बहुत अधिक तवज्जो मिलने वाली नहीं है। चाहे वो जदयू हो या कोई और पार्टिया। 


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इसकी पहली झलक तब मिली जब एनडीए के नए मंत्रिमंडल में जदयू के महज एक सांसद को शामिल करने का प्रस्ताव दिया गया। जदयू ने इस प्रस्ताव को इस बिनाह पर नामंजूर कर दिया कि समानुपातिक आधार पर मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई। 




जदयू का तर्क था कि लोजपा के छह सांसद हैं, तो उसे एक मंत्री पद मिला, लेकिन जदयू के 16 सांसद हैं, तो उसे भी एक ही पद क्यों दिया गया। 



जदयू के मुखिया और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसको लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर साफ लहजे में कह दिया कि वह मंत्रिमंडल में सांकेतिक प्रतिनिधित्व नहीं चाहते हैं। अलबत्ता उनकी पार्टी सरकार के साथ है और रहेगी। 


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उन्होंने कहा, ‘भाजपा को पूर्ण बहुमत है और हमारा पूर्ण समर्थन है, लेकिन उनकी बात से लगा कि एनडीए के घटक दलों को व जेडीयू को भी वो सांकेतिक रूप प्रतिनिधित्व देना चाहते हैं।’



उन्होंने आगे कहा, ‘वे (BJP ) एक सीट देना चाहते थे, हमने जदयू की कोर टीम के साथ बैठक की और ये प्रस्ताव रखा, तो सभी ने कहा कि यह प्रस्ताव ठीक नहीं है।’


नीतीश कुमार ने अटल बिहार वाजपेयी की सरकार की मिसाल देते हुए कहा कि पहले भी समानुपातिक भागीदारी होती थी। इसलिए नए मंत्रिमंडल में भी भागीदारी समानुपातिक होनी चाहिए। 



एनडीए मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह कार्यक्रम के तुरंत बाद बिहार की नीतीश सरकार की तरफ से खबर आई कि नीतीश सरकार भी कैबिनेट का विस्तार करेगी। 


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इस घोषणा के साथ ही यह अफवाह भी उड़ी कि नीतीश कुमार केंद्रीय मंत्रिमंडल का बदला भाजपा से राज्य कैबिनेट में लेंगे। यह अफवाह सही साबित हुई और बीते दो जून को बिहार में जिन आठ नए मंत्रियों ने शपथ ली, उनमें भाजपा का एक भी नेता नहीं था। 




नीतीश कुमार ने बाद में मीडिया के सामने सफाई दी कि जो पद खाली थे, वे जदयू कोटे के थे, इसलिए भाजपा को प्रतिनिधित्व नहीं मिला। नीतीश जब मीडिया से बात कर रहे थे, तो उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी बगल में खड़े थे। मगर उनके चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई थीं। 




मंत्रिपरिषद के विस्तार के बाद चला इफ्तार का दौर. जदयू, भाजपा, राजद और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेकुलर) ने अलग-अलग इफ्तार पार्टियां दी गयी। 




भाजपा की इफ्तार पार्टी में नीतीश कुमार नहीं पहुंचे, तो जदयू की इफ्तार पार्टी से भाजपा ने दूरी बनाई। हां, जीतनराम मांझी ने इफ्तार पार्टी दी, तो नीतीश कुमार उसमें शामिल हुए और राम विलास पासवान ने इफ्तार पार्टी की, तो नीतीश कुमार और सुशील मोदी ने उसमें शिरकत किया। 



2017 में नीतीश कुमार के महागठबंधन से अलग होने के बाद राजद की तरफ से अनेक बार ये बयान आया कि नीतीश कुमार अगर दोबारा महागठबंधन का हिस्सा बनना चाहेंगे, तो उन्हें जगह नहीं मिलेगी।  लेकिन, 2019 के आम चुनाव में महागठबंधन की करारी शिकस्त के बाद राजद समेत अन्य गठबंधन पार्टियां नीतीश कुमार को लेकर चुप्पी साधे हुई हैं। 


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चुनाव परिणाम के बाद कोई भी नेता नीतीश पर जुबानी हमला नहीं कर रहा है। समझा जा रहा है कि राजद व अन्य पार्टियां अंदरखाने इस कवायद में लगी हुई हैं कि नीतीश कुमार दोबारा महागठबंधन में शामिल हो जाएं। 


भाजपा और जदयू के बीच बढ़ी खटास को महागठबंधन एक सुनहरे मौके की तरह देख रहा है और वह किसी भी सूरत में इसका फायदा उठाना चाहता है। 




राजद के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने तो नीतीश कुमार को महागठबंधन में आने का न्योता भी दे दिया। उन्होंने कहा, ‘नीतीश जी निश्चित रूप से पाला बदलेंगे, लेकिन कोई भी इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता है कि वह कब करेंगे या क्या करेंगे।  ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है। यह आश्चर्यजनक नहीं है। मैं बस इतना चाहता हूं कि बिहार में बीजेपी के खिलाफ सभी लोग साथ आएं।’



वहीं, राबड़ी देवी ने भी कहा कि नीतीश कुमार महागठबंधन में शामिल हो सकते हैं।  हालांकि, जदयू नेता अजय आलोक ने इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्वीट किया, ‘कुछ नाम से हमारे नेता को ये लोग बुलाते थे शायद? याद आया कि नहीं और आज वोट की चोट क्या लगी तो चाचा याद आने लगे! बुला रहे हैं, भाई लोग आप ही बताएं अब जब भैंस पानी में चली गई तो हम क्यों निकालें?’


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केंद्रीय मंत्रिमंडल में सांकेतिक प्रतिनिधित्व से जदयू का इनकार, राज्य कैबिनेट के विस्तार में भाजपा को जगह नहीं मिलने, इफ्तार पार्टियों में गैरमौजूदगी और राजद का बयान, इन सारे घटनाक्रमों का सियासी परिणाम क्या निकलेगा?




2017 के मध्य में जब नीतीश कुमार राजद से अलग होकर दोबारा एनडीए में आए और बिहार में सरकार बनाई, तो ये भाजपा की बड़ी जीत थी, क्योंकि 2019 में केंद्र में दोबारा एनडीए की सरकार बनाना भाजपा की पहली प्राथमिकता थी और इसके लिए भरोसेमंद घटक दलों की जरूर थी। 




2020 का बिहार विधानसभा चुनाव पर है सबकी नजर


अगले साल नवंबर में बिहार विधानसभा का चुनाव होने जा रहा है।  वर्ष 2014 के आम चुनाव में बुरा प्रदर्शन करने वाले जदयू, राजद व कांग्रेस ने इस बार और भी बदतर प्रदर्शन किया। अगले ही साल बिहार विधानसभा चुनाव हुआ, जिसमें जदयू, राजद व कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और सरकार बनाई थी। 




जानकार बताते हैं कि अगर भाजपा और जदयू के बीच तल्खी इसी तरह जारी रही, तो अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में 2015 के फॉर्मूले का दोहराव हो सकता है। 




राजनीतिक विश्लेषक डीएम दिवाकर कहते हैं, ‘नीतीश कुमार ने राजद के साथ मिलकर सरकार चलाई भी है, इसलिए मुमकिन है कि वह दोबारा राजद के साथ आ जाएं।’




डीएम दिवाकर कहना है कि भाजपा खुद भी 2020 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ना चाहती है, इसलिए भी वह जदयू को बहुत तवज्जो नहीं देनेवाली।  ऐसे में आने वाले समय में अगर नीतीश कुमार महागठबंधन का हिस्सा बन जाएं, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। 



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